उजालों की जानिब कहाँ जिन्दगी है
दहकती सुबह ,खौलता आसमाँ है
चलो ढूँढ़ते हैं गमों का बहाना
बहुत देर से रोशनी का समाँ है ।
बहुत चाँदनी जी चुकी हैं निगाहें
कि आँखों में सीलन है,कोहरा घना है
न अब ख्वाब डालो हमारी नसों में
उनींदे समय को जरा जागना है ।
कहीं और ढूँढ़ें चलो आशियाने
फ़लक पर बहुत रंज बिखरे पड़े हैं
कहाँ तक सितारे बुझाते रहोगे
तुम्हारे शहर में हज़ारों पड़े हैं
खड़े आईनों में कई अजनबी थे
हमें होश आया संभलते-संभलते
बड़ा प्यार था आदमी से खुदा को
फ़रिश्ता हुआ वो बदलते-बदलते
-आलोक शंकर
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Wednesday, February 20, 2008
Monday, February 19, 2007
आगाज़
नोट : यह कविता पत्रिका 'अनुभूति ' में प्रकाशित है ।
शुष्क-शीर्ण
कमलिनि लता में
नवल किसलय
आज फ़ूटा -
नीरसा मृत्तिका में
कहीं तो रस आज बाकी है।
सुनो -
निस्पंद
नीरव
निर्वात में गुनगुनाते
नूपुरों का क्वणन-
दिगन्त शब्दमान है;
जिह्वा कट गयी ,
वदनों में
कुछ -
आवाज़ बाकी है।
बचो,
झन्झा से उड़ गये पर्दे धवल
द्युति की द्युति में
दिक्कालिमा को प्रश्रय नवल;
कुछ भी तो नहीं अकिंचन-
श्यामल ,शीतल
क्या कहीं कोई
राज़ बाकी है?
सब तो है , पर
कुछ नहीं,
शायद-
तलाश आज़ बाकी है।
देखो-
आदमी की लाश से
कुछ अमर्त्य सा
उठ रहा है;
हिम सा उष्ण,
आग सा शीतल
अभी-
आदमीयत का
आगाज़ बाकी है।
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