मेरे निर्विकार को लिखने वक्त नही आएगा ;
अपने शोणित की गरिमा से वह लिखा जायेगा
Tuesday, June 10, 2008
Tuesday, March 11, 2008
मेरे चिंतन , मेरे प्रमाद
यह सुखद मौन, हा: यह विषाद
अंतस की तुमुल विविधता रे !
यह आलिंगन , या आर्त्तनाद ?
Thursday, February 21, 2008
राम नही बसते धरती के मंदिर और शिवालो में
या चन्दन टीका करके बस भोग लगाने वालो में
वे मर्यादा की प्रधानता का प्रतीक हैं , संबल है
उन हृदयों में राम बसें ,जो प्रेम भाव से विह्वल हैं
-आलोक
Wednesday, February 20, 2008
उजालों की जानिब कहाँ जिन्दगी है
दहकती सुबह ,खौलता आसमाँ है
चलो ढूँढ़ते हैं गमों का बहाना
बहुत देर से रोशनी का समाँ है ।
बहुत चाँदनी जी चुकी हैं निगाहें
कि आँखों में सीलन है,कोहरा घना है
न अब ख्वाब डालो हमारी नसों में
उनींदे समय को जरा जागना है ।
कहीं और ढूँढ़ें चलो आशियाने
फ़लक पर बहुत रंज बिखरे पड़े हैं
कहाँ तक सितारे बुझाते रहोगे
तुम्हारे शहर में हज़ारों पड़े हैं
खड़े आईनों में कई अजनबी थे
हमें होश आया संभलते-संभलते
बड़ा प्यार था आदमी से खुदा को
फ़रिश्ता हुआ वो बदलते-बदलते
-आलोक शंकर
Saturday, February 16, 2008
टीस
कमरे के बियाँबान में
काँटों को छूती हुई
अष्टावक्र सी दिखती हुई एक आकृति
लेटी है,
या बचना चाहती
काँटों से बदन पर लिख रहे
अँधेरों से--
शरीर के गँदले पर
चीरे की कालिख़ दुखती है
आह! यह पिंजर!! पिंजर !!
फड़फड़ाते हुए विखंडित पंख ,
मिरगी-से काँपते -उछलते
फड़-फड़ फड़-फड़, शांत ।
असंभव है , उल्लंघन -
फड़फड़ाने की सीमा-ऊर्जा का ;
दूसरा भाग-
कसमसाता है, फड़-फड़ होती थोड़ी
हाय! चुभते हैं काँटे,
छलनी-छलनी होती चमड़ी में
और बारीक छिद्र करते -
तीर सी चुभती है हवा, समाती है
भीतर- कँपा देती वहाँ के निर्वात को भी !
उग आते हैं वक्र के आठों चिन्ह
चेहरे पर भी !
विध्वंसक है टकराव,
बाहर-भीतर की कालिख का-
जाने कब फ़ट पड़े
विष की झील के नीचे
सोया ज्वालामुखी,
छनाक! तोड़कर पानी की परत को
चमड़ी की छेदों से निकलती
विषैली आग और धुआँ
बदल न दे हरी भरी दुनिया को
गैस चेम्बर में!
कोटिशः बार मृत बदन
के विषैले धुएँ से
मर न जाएँ हजारों जीवित लोग,
चीखते-चिल्लाते-भागते
एक-दूसरे और अपने आप से,
और मढ़ें इल्ज़ाम धुएँ पर-
उफ़! घुटन होती है,
फ़िर वही कसमसाहट!
चमड़ी में फ़िर छेद !
फ़िर चुभन!
धुआँ ! धुआँ !!
कमरे की टीस असह्य है ।
उठकर भागता है
लेकर कटे-फटे बदन को ले-
रिसते गंदे लिज़लिज़े रक्त को
तोड़कर दरवाज़ा
जंगल के उस अकेले कमरे का,
झील की तरफ़
नंगे पाँव ,
अपने हिस्से की लाल कीचड़ में
डुबोते हुए पाँव ,
अंगुलियों के बीच की फ़ाँक से
ठंढे कीचड़ को रास्ता देते हुए,
और रखते हुए कदम
हड्डियों के ढेर पर !
जंगल के अपने हिस्से की
छिदी, रिसती आत्माओं की हड्डियाँ
पाँवों के नीचे आकर टूटतीं
और
चुभतीं पाँवों में
चूसकर रक्त थोड़ा
मिलाती और लाल रंग
कीचड़ में !!
झींगुरों की टिर्र टिर्र ………
जंगल की टीस असह्य है !
तेजी से भागता है-
खिसकती-सिसकती खोपड़ियों पर
सरपट रखता पैर,
झील के पानी से
जल्दी जल्दी ,धोता है लाल खून,
सफ़ेद पानी में लाल रंग
घुलता है धीरे धीरे,
हो जाता है हल्का लाल
पनियाले रक्त से धुलता है
और रक्त , अजस्र स्रोत से निकलता हुआ,
और झील में भर जाता है -
लाल पानी;
लाल से धुलता लाल !!
झील की टीस असह्य है ।
Read more...
Wednesday, January 23, 2008
थी बड़ी ही देर चुप्पी
लोग कहते हैं, कि हमने चाहतों में मात खाई
इस कदर लहरों ने अपने प्यार की कश्ती डुबाई
बस जरा सी बात थी ,अपनी समझ में जो न आई
मैं जिसे समझा सफ़र है, तुम उसे समझे लड़ाई
——— 2———-
पीर मेरी रागिनी है, दर्द मेरा साज़ है
खो गये अल्फ़ाज़ मेरे ,गुम बड़ी आवाज़ है
अब न पूछो आज़ शायर क्यों गज़ल कहता नहीं
मय्यतों में गज़ल का होता न कोई रिवाज़ है
———3———
हैं चकित सारे सितारे,हो गया कवि बावला है
आसमाँ पर इन्कलाबों की फ़सल बोने चला है
ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,
आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।”
———-4———-
चाहतों को कोई आशियां न मिला
मदीने में भी गये, खुदा न मिला
ढूँढ़ते हम रह गये सारे जहान में
एक भी सुकून का दुकाँ न मिला
——–5———–
थी बड़ी ही देर चुप्पी , अब ज़रा आवाज़ हो
अँधेरों के इस शहर में सुबह का आगाज़ हो
कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।
-आलोक शंकर
Monday, January 14, 2008
गज़ल
महफ़िलों की नीयतें बदल गयीं हैं आजकल
महमिलों से आजकल शराब निकलती नहीं
क़ातिलों के कायदे खुदा भी जानता नहीं
जान गई पर मुई हिज़ाब निकलती नहीं
जिन्दगी जवाब चाहती हरेक ख्वाब का
ख्वाब बह गये मगर अज़ाब निकलती नहीं
ख़्वाहिशों के अश्क हैं हज़ार मौत मर रहे
कब्रगाह से मगर चनाब निकलती नहीं
क़ौम कई लुट गये मोहब्बतों के खेल में
क्यों इबादतों से इन्कलाब निकलती नहीं
तेरे इन्तजार में बिगड़ गयी हैं आदतें
रह गयी है उम्र बेहिसाब निकलती नहीं ।
इस क़दर है ज़िन्दगी की लौ यहाँ बुझी-बुझी,
एक भी चराग़ से है आग निकलती नहीं