Friday, March 30, 2007

याद

कोई हँसी न खुशबू देगी कहीं,
दीवारें कुछ गढ़ जायेंगीं ,
पत्थर , चंदन , शबनम, धागों
की आवाज़ें रह जायेंगीं ।
आड़ी तिरछी तसवीरों की,
रंगीं बातें बह जायेंगीं ;
जब धुँध कहीं पर कम होगा,
तेरी बातें रह जायेंगीं ।

जिंदगी , आवाज़ तेरी , बुझ गयी तो क्या करुँगा ?
याद की परछाइयों में ही कहीं ढूँढा करूँगा ।

1 comments:

miredmirage March 31, 2007 at 9:42 AM  

बहुत सुन्दर।
घुघूती बासूती

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