Sunday, March 15, 2009

एक आदमी था


एक कवि था

या शायद कवि नहीं था-

लाख कोशिश करता
पर नहीं लिख पाता प्रेम कवितायें,
नहीं मान पाता था
घर के पास रहने वाली लड़की को चाँद
या फ़िर परी |

न उसे लड़कियों के परी
होने पर यकीन होता ,
न ही चांद के लड़की होने का |
लड़की उसके लिये व्रत रखती,
पर वो नहीं समझ पाता
उसके व्रत और अपनी उम्र के रिश्ते को
उसे कभी समझ न आया
कि सुन्दर को सुन्दर कहना
और प्यार को प्यार कहना
क्यों जरूरी है।
वह दिल से सोचती थी,
वह दिमाग पर यकीन करता |
फ़िर भी, उसके जिद करने पर
वह लिखता था कवितायें-
जिनमें सूरज
अपनी मर्जी से ढलता था,
उसकी पलकों के झुकने पर नहीं,
और नदियों में मटमैला पानी बहता था
रोमांटिक कहानियाँ नहीं ।
उसके लिखे को कभी
किसी ने कविता
और उस कवि को कवि नहीं माना |

एक संत था
या शायद संत नहीं था -
लाख कोशिश करता,
पर नहीं मान पाता
पत्थर को भगवान,
नहीं देख पाता कभी
आसमान में बसे हैवन और हेल को-
वह कभी नहीं समझ पाया
कि
भगवान को भगवान
होने की याद दिलाना क्यों जरूरी है
और आदर देने के लिये
सिर झुकाना क्यों जरूरी है
कभी उसके पल्ले नहीं पड़ा ,
उसके जीवन का कोई और
कैसे जिम्मेदार है
उसने कभी सिर नहीं झुकाया,
प्रार्थना नहीं की
और खुद को छोड़कर किसी और पर
यकीन न किया |
उसके किये को कभी भी इबादत
और उसे कभी भी संत नहीं माना गया |

एक आदमी था
या शायद आदमी नहीं था -

3 comments:

संगीता पुरी March 15, 2009 at 12:11 PM  

अच्‍छे भाव है इस कविता के ।

Mired Mirage March 15, 2009 at 1:47 PM  

अच्छी कविता है। कविता, कवि और संत तीनों दिलचस्प हैं। तीनों समझ आ रहे हैं। कवि और संत शायद सही भी हैं।
घुघूती बासूती

Dr.Bhawna March 16, 2009 at 12:53 AM  

बहुत प्रभावशाली रचना ...बहुत-बहुत बधाई...

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