Tuesday, April 20, 2010

ये खराश-ए-दिल है क्यों

ये खराश-ए-दिल है क्यों , हैं निगाहें लहूलुहान
कल शब् तो गुल खिले थे इधर , ईदगाह थे

मेरा ही तो दिल नहीं है कि जिसपर सितम हुए
तब उनकी निगाहों से जमाने तबाह थे

सब वक्त लुट गया मेरा , एक पल भी ना रहा
एक दौर था कि हम भी बड़े बादशाह थे

2 comments:

savan kumar August 13, 2015 at 9:18 AM  

सुन्दर शब्द रचना
http://savanxxx.blogspot.in

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