Monday, February 19, 2007

तुम होते तो …


तुम होते तो
इतना कुरूप अंतर का यह शृंगार न होता
नयनों में यह बद्ध नीर , उर का पीड़ित संसार न होता ।

मानस -पटल घने कोहरे में जब भी दुःखाकुल होता;
शोक - मलिन उर के पट पर नयनों की उजियाली मलता ।

विपदा के वीरानों में जब भी आहट तेरी दिखती;
निज - प्राणों के टुकड़े करके , सुख- संगीत बहा देता ।

प्रिये ! तुम्हारा मन किंचित, अँधियारों से विचलित होता;
प्रकृति से विद्रोह उठा मैं नव- आदित्य उगा देता

……… तुम होते तो ।

6 comments:

उन्मुक्त February 19, 2007 at 7:52 AM  

हिन्दी चिट्ठे जगत में आपका स्वागत है।

miredmirage February 19, 2007 at 1:12 PM  

सुन्दर शब्द, सुन्दर भाव ! रचना बहुत अच्छी लगी ।
घुघूती बासूती
ghughutibasuti.blogspot.com
miredmiragemusings.blogspot.com/

Divine India February 20, 2007 at 1:27 AM  

सुंदर रचना के साथ चिट्ठा जगत में आपका प्रवेश,
बधाई स्वीकारे!!

रीतेश गुप्ता February 20, 2007 at 1:41 PM  

आपकी कविता में सुदंर प्रवाह है ...बधाई

आलोक शंकर March 16, 2007 at 12:23 PM  

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद, ऐसे ही प्रोत्साहन देते रहिये ।

shanoo April 7, 2007 at 8:26 PM  

आलोक बहुत सुंदर रचना है,...लिखते रहिए।
सुनीता

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