Friday, October 2, 2009

इतने बुतों के ढेर पर बैठा है आदमी

इतने बुतों के ढेर पर बैठा है आदमी
कि आज अपने आप में तनहा है आदमी|

अपने खुदा के नाम पर मरना तो है कबूल
इंसां से किस कदर यहाँ खफा है आदमी |

किस किस की आह पर भला अब जिंदगी रुके,
कब जिंदगी की आह पर ठहरा है आदमी|

कल डूबते रहे कोई तिनका नहीं मिला ,
क्यों इतने गहरे ख्वाब से लड़ता है आदमी |

उल्फत की राह में कई , 'आलोक' , मर गए
पर नफरतों से आज भी मरता है आदमी

3 comments:

Pankaj Mishra October 2, 2009 at 3:25 AM  

आज अपने आप में तनहा है आदमी , शायद ऐसा ना होता अगर हम लोलुपता के चक्कर में ना पड़ते तो

विनोद कुमार पांडेय October 2, 2009 at 5:08 AM  

आदमी इस तरह से बदल रहा है की आज कल पता ही नही चल पता की तब कौन था और अब कौन हो गया

वाणी गीत October 2, 2009 at 6:30 PM  

ये आदमी ...क्यों करता है ऐसा आदमी ...क्यों मरता है नफरतों में आदमी ...
सुन्दर कविता ...!!

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