Monday, January 14, 2008

गज़ल

महफ़िलों की नीयतें बदल गयीं हैं आजकल
महमिलों से आजकल शराब निकलती नहीं

क़ातिलों के कायदे खुदा भी जानता नहीं
जान गई पर मुई हिज़ाब निकलती नहीं

जिन्दगी जवाब चाहती हरेक ख्वाब का
ख्वाब बह गये मगर अज़ाब निकलती नहीं

ख़्वाहिशों के अश्क हैं हज़ार मौत मर रहे
कब्रगाह से मगर चनाब निकलती नहीं

क़ौम कई लुट गये मोहब्बतों के खेल में
क्यों इबादतों से इन्कलाब निकलती नहीं

तेरे इन्तजार में बिगड़ गयी हैं आदतें
रह गयी है उम्र बेहिसाब निकलती नहीं ।

इस क़दर है ज़िन्दगी की लौ यहाँ बुझी-बुझी,
एक भी चराग़ से है आग निकलती नहीं

5 comments:

आलोक शंकर January 15, 2008 at 9:42 AM  

to listen this poem , check
www.alok.shanker.googlepages.com

alok January 16, 2008 at 7:46 AM  

तेरे इन्तजार में बिगड़ गयी हैं आदतें
रह गयी है उम्र बेहिसाब निकलती नहीं ।

waah kavi mahoday .. mujhe aapke prerna shrot se milne ka ichha hota hai .. kya is nacheej ki ye chhoti si khwahish kabhi aap pura karenge ??

Enlightened !! June 15, 2008 at 2:52 AM  

अलोक जी,
इस ग़ज़ल को पढ़कर लगता है की आपकी लेखनी में वह सभी जरुरी सामग्री है जो एक परिपक्व कवि में होना चाहिए | बेहतरीन रचना है यह !
आभार,
सतीश

anant July 19, 2008 at 3:12 AM  

vaah vaah ............ ati sundar

दिव्यांशु शर्मा February 19, 2009 at 11:02 PM  

क्यों इबादतों से इन्कलाब निकलती नहीं....
kaafi umda ghazal... aap ko shilpi par padha hai.. kaafi sundar likhte hain aap..

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