Saturday, January 31, 2009

सलीम बुढ्ढे पर मत रो

नहीं जी , अब डर नहीं लगता ,
दर्द नहीं होता
और आंसू भी दीखते नहीं पलको पर ,
अब कुछ टूटता भी है
तो बे-आवाज टूटता है

करना क्या है ?
बस पड़े पड़े
समय को पकड़ कर रुई बना लेता हूँ ,
और कातता हूँ रोज
धागे , सूत और रेशम के -
कल भेजी थी उसके लिए बना कर
रेशमी गुलाबी साड़ी ,
सोचा तो था कि ख़ुद ले जाऊं
पर समय बहुत है ,
और कितना रुई है
और कितने धागे कातने हैं ,
कह नहीं सकता

पहले ठीक नहीं लगता था यहाँ ,
अब ठीक है
रोज सुबह आती है एक तितली -
हाँ , अब खनक नहीं रही बदन में
और दिमाग कि फिरकी भी थम गई है
अब एकांत है ,सकून है

पुराने दिनों में ?
अजी ,तब सोना मिटटी हुआ करता था,
और उडानों में होते थे फंदे
बारीक बारीक -
जिनसे छू कर
छिल जातीं थीं उंगलियाँ -
तब मुझे इजाजत नहीं थी ,
कि चुन सकूँ
दशा और दिशा
अपने सपनों की ,....

रिश्तेदार ?
कल को संभाल कर रखा था
तकिये के नीचे
रोज चुभता था ,
और नींद से रगडा था उसका
तो एक दिन उड़ा दिया
पत्तों के साथ
आपको कुरेदना उधेड़ना ही है तो
यहीं पड़े हैं
इक्के दुक्के टुकड़े
कई किस्सों के , किश्तों में -
जिनका हिसाब कई बार ढूँढा,
पर हर बार
बत्तख की शक्ल वाली पानी की बोतल ही जीतती ,
जिसकी नाक शायद अब भी बहती है

अपने ?
सच कहो तो मुझे कोई
और किसी को मैं याद नहीं
या रखना नहीं चाहते , दोनों -
मैं जरा स्वार्थी आदमी हूँ जी
गम के मामले में
उन्हें कोई हक़ नहीं
कि
छू सके
मेरी चीखों की झालर भी |

8 comments:

हिमांशु January 31, 2009 at 5:52 PM  

"गम के मामले में
उन्हें कोई हक़ नहीं
कि
छू सके
मेरी चीखों की झालर भी"

सुन्दर पंक्तियां, शब्द प्रयोग ने लुभाया बहुत.

Udan Tashtari January 31, 2009 at 7:45 PM  

बहुत उम्दा!! अच्छा लगा पढ़कर.

विश्व दीपक ’तन्हा’ January 31, 2009 at 9:19 PM  

बेहतरीन!

पर समय बहुत है ,
और कितना रुई है
और कितने धागे कातने हैं ,
कह नहीं सकता

आपको कुरेदना उधेड़ना ही है तो
यहीं पड़े हैं
इक्के दुक्के टुकड़े
कई किस्सों के , किश्तों में -
जिनका हिसाब कई बार ढूँढा,
पर हर बार
बत्तख की शक्ल वाली पानी की बोतल ही जीतती ,
जिसकी नाक शायद अब भी बहती है

दिल में जम गई उपरोक्त पंक्तियाँ।

ऎसे हीं लिखते रहें।

और हाँ, शीर्षक भी मज़ेदार है।

बधाई।
-विश्व दीपक

तरूश्री शर्मा February 1, 2009 at 7:38 PM  

आपने बहुत खूब लिखा है आलोक....गंभीरता के साथ, बढ़िया कविता। खासकर ये पंक्तियां....
पुराने दिनों में ?
अजी ,तब सोना मिटटी हुआ करता था,
और उडानों में होते थे फंदे
बारीक बारीक -
जिनसे छू कर
छिल जातीं थीं उंगलियाँ -
तब मुझे इजाजत नहीं थी ,
कि चुन सकूँ
दशा और दिशा
अपने सपनों की ,....
छू गई आपकी लेखनी। अगली बार फिर पढ़ने का मन करेगा।

Dr. RAMJI GIRI February 1, 2009 at 10:19 PM  

उम्दा लेखनी ,सुन्दर ,बेहतरीन !!!!

mahashakti February 2, 2009 at 4:40 AM  

बहुत खूब भाई

रश्मि प्रभा February 2, 2009 at 10:10 PM  

दर्द और खुद्दारी भरी रचना,बहुत ही अच्छी..........

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