Sunday, February 18, 2007

बारिश


वसुधा के अतृप्त अधर पर
हरे पल्लवों से ढल - ढलकर
अम्बर के प्याले से मानो,
जलजों ने अमृत ढाला है;
धूल अर्श पर बहुत पडी थी ,
बारिश ने सब धो डाला है।


प्यासी ,थकी दरारों मे,
अमृत डाला है घट भर भर कर;
बालवृन्द सब झूम उठे,
हैं लगे नहाने किलकारी भर।
स्वस्ति सुधा की इन बूँदों ने,
मन आह्लादित कर डाला है;
स्नेह भरा हृत्पात्र,नयन में,
बारिश ने कुछ कर डाला है।


पृथा, कृषक की आँखो से,
गिर पड़े हर्ष-चक्ष्वारि उमड़कर;
कहीं मगर, शोकान्धकार
ले आये खल घट घुमड़-घुमड़कर ।
शुष्क पत्र सदृश अन्तस पर,
नीर भरा क्यों जल डाला है;
याद दिला दी उस सावन की ,
बारिश ने क्या कर डाला है।

इसी भाँति जगती का रज- कण,
इन्द्रधनुष सा रंग डाला है;
धूल अर्श पर बहुत जमी थी,
बारिश ने सब धो डाला है।

- आलोक शंकर

2 comments:

Shishir Mittal (शिशिर मित्तल) February 21, 2007 at 11:19 AM  

Your writing style has definitely evolved. The flow of poetry is better now, as compared to initial poems. I had the pleasure of going through many of them.

In Bhishma also, chhand has been better maintained in the first one. It is flawless. Very fine. If you do not take it otherwise, I must add that the secon one on Bhisma required a little more polish on ur side.

'Baarish' is another good one. It is a living example that u have now surpassed your initial phase. Your writing now (at least in my opinion) on par with mature poets. I hope I will have the pleasure of reading your newer contributions as well.

Please keep me informed.

आलोक शंकर April 7, 2007 at 10:04 PM  

thank you, shishir , for your valuable comments...

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