Sunday, February 18, 2007

आत्म - मंथन

सिन्धु की विकल रूह के तट पर


मन की डोर थामकर कसकर


फ़िरता हूँ खाली खाली सा


अम्बर की लोहित लाली सा;


पतझड में झरकर गिरता हूँ


आँधी में उड़ता फ़िरता हूँ ,


चखता हूँ अस्तित्व जलाकर


नित नित पावक में सुलगाकर


पर निःस्वाद निरा लगता है,


कुछ बदला - बदला लगता है।


मेरी परिवर्तित सी काया


दुर्बल, निराकार यह छाया


अधरों पर अत्रिप्त उदासी


लोलुप कायरता सी प्यासी


देख रहा हूँ सब, क्षणभंगुर


कल फ़ूटेगा फ़िर जब अंकुर


निकलूँगा कोमल तन पाकर


फ़िर आकार नवीन बनाकर


अम्बर में फ़िर रंग भरूँगा


वारिधि का संगीत बनूँगा ।


लहरों पर फ़िर उतराऊँगा


मद्धम मद्धम लहराऊँगा;


अब , जब आखिर साँस बची है


यह चेतना नवीन जगी है।


मैं ही व्यर्थ शोक करता था,


इस क्षण से डरता फ़िरता था


पतझड़ का , आँधी , सागर का,


भू के जीव अंश नश्वर का;


अम्बर का , गिरि का , निर्झर का


पीड़ा से आहत , जर्जर का


होता अद्वितीय मिलन है


प्रकृति का बस यही नियम है।


1 comments:

Shishir Mittal (शिशिर मित्तल) February 21, 2007 at 11:23 AM  

Bahut pyaari kavita hai. Mere khayaal se hini ke naye sitaare ko ubharte hue dekh raha hoon, jo lagataar nikhartaa hi jaa hara hai!

Badhai, ek baar phir!

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